सव्ववियप्पहं तुठ्टहं चेयणभावगयाहं ।
कीलइ अप्पु परेण सिहु णिम्मलझाणठियाहं ॥110॥
अन्वयार्थ :
जिसके सर्व विकल्प छूट गये हैं और जो चेतनभाव को प्राप्त हुआ है, वह आत्मा निर्मल ध्यान में स्थित होकर परमात्मा के साथ केलि करता है ।