करहा चरि जिणगुणथलिहिं तव विल्लडित पगाम ।
विसमी भवसंसारगई उल्लूरियहि ण जाम ॥112॥
अन्वयार्थ : हे मस्तहाथी ! हे करभा ! इस विषम भवसंसार की गति का जबतक तू उच्छेदन न कर डाले, तबतक निजगुणरूपी बाग मे मुक्तरूप से तपरूपी वेल को तू चर.....तेरे बन्धन (पैगाम) को खोल दिया है ।