एक्क ण जाणहि वट्टडिय अवरु ण पुच्छहि कोइ ।
अहुवियद्दहं डुंगरहं णर भंजंता जोइ ॥114॥
अन्वयार्थ : एक तो स्वयं मार्ग को जानते नहीं और दूसरे किसी से पूछते भी नहीं, ऐसे मनुष्य वन-जंगल तथा पहाड़ों में भटक रहे हैं, उनको तू देख ।