छहदंसणधंधइ पडिय मणहं ण फिट्टिय भंति ।
एक्क देउ छह भउ किउ तेण ण मोक्खहं जंति ॥116॥
अन्वयार्थ : षट्दर्शन के धन्धे में पड़े हुए अज्ञानियों के मन की भ्रान्ति न मिटी । अरे रे ! एक देव के छह भेद किये, इससे वे मोक्ष नहीं जाते ।
भारत का आस्तिक दर्शन -- न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, पूर्व मीमांसा और उत्तरमीमांसा (वेदांत) में बाँटा गया है ।
1. न्याय दर्शन - (गौतम ऋषि) । बुद्धि को सर्वोच्च स्थान, बुद्धि के द्वारा सब कुछ जाना जा सकता है ।
2. वैशेषिक - दर्शन (कणाद) परमाणुवाद, परमाणु जगत के उपादान कारण । परमाणु एकत्रित व पृथक होते रहते हैं । यह कार्य अनंत काल से चला आ रहा है । अग्नि व पृथ्वी के परमाणुओं द्वारा ईश्वर के ध्यान-मात्र से ब्रह्माण्ड उत्पन्न हो जाता है ।
3. सांख्य - (कपिल मुनि) पच्चीस तत्व, जिनमें पुरुष व प्रकृति मुख्य हैं । जब तक पुरुष प्रकृति से अपना पृथकत्व नहीं जान लेता तब तक संसार का नाटक चला करता है ।
4. योग - (पतंजलि मुनि) चित्त वृत्ति के निरोध के लिए अष्टांग योग की साधना ।
5. पूर्व मीमांसा (कर्म मीमांसा) - (जैमिनि मुनि) नित्य यज्ञादि कर्मकांड करने से ही सच्ची मुक्ति ।
6. उत्तर मीमांसा (वेदांत) (बादरायण या व्यास मुनि) प्रमाण दो हैं : श्रुति (प्रत्यक्ष) व स्मृति (अनुमान) । इस जगत् में ब्रह्म ही सत्य है । पुरुष व प्रकृति उसी के दो परिवर्तित स्वरूप हैं । यह संसार ब्रह्म के संकल्प का परिणाम है । यह उसकी लीला है ।