अप्पा मल्लिवि एक्कु पर अण्णु वइरिउ कोइ ।
जेण विणिम्मिय कम्मडा जइ पर फेडइ सोइ ॥117॥
अन्वयार्थ : एक अपने आत्मा को छोड़कर अन्य कोई तेरा वैरी नहीं है; अतः हे योगी ! जिस भाव से तूने कर्मों का निर्माण किया है, उस परभाव को तू मिटा दे ।