जइ वारउं तो तहिं जि पर अप्पहं मणु ण धरेइ ।
विसयहं कारणि जीवडउ णस्यहं दुक्‍ख सहेइ ॥118॥
अन्वयार्थ : यद्यपि मैं रोकता हूँ, तो भी मन पर मे जाता है । वह मन अपने में विषय को धारण करता है, परन्तु आत्मा को धारण नहीं करता । मन के द्वारा विषयों में भ्रमण करने के कारण जीव नरकों के दुःखों को सहता है ।