जीव म जाणहि अप्पणा विसया होसहिं मज्झु ।
फल किं पाकहि जेम तिम दुक्ख करेसहिं तुज्झ ॥119॥
अन्वयार्थ :
हे जीव ! तू ऐसा मत जान कि ये विषय मेरे हैं और मेरे रहेंगे । अरे ! ये तो किम्पाक फल की तरह तुझे दुःख ही देंगे ।