विसया सेवहि जीव तुहं दुक्‍खहं साहिक एण ।
तेण णिरारिउ पज्जलइ हुववहु जेम घिएण ॥120॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तू विषयों का सेवन करता है, किन्तु वे तो दुःख के ही देनेवाले हैं । जैसे घी के डालने से अग्नि प्रज्वलित होती है, वैसे विषयों के द्वारा तू बहुत जल रहा है ।