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गाथा १२१-१३०
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असरीरहं संधाणु किउ सो धाणुक्कु णिरुत्तु ।
सिवतत्तिं जिं संधियउ सो अच्छइ णिच्चिन्तु ॥121॥
अन्वयार्थ :
जिसने अशरीरी का सन्धान किया, वही सच्चा धनुर्धारी है; और चित्त को एकाग्र करके जिसने शिव-तत्त्व को साध लिया, वही सच्चा निश्चिंत है ।