हलि सहि काइं करइ सो दवाणु, जहिं पडिबिंबु ण दिसइ अप्पणु ।
धंधवालु मो जगु पडिहासइ, धरि अच्छंतु ण घरवइ दीसइ ॥122॥
अन्वयार्थ : अली सखी ! भला ऐसे दर्पण को क्‍या करें जिसमें आत्मा का प्रतिबिंब न दिखे ? मुझे तो यह जगत बहावरे (सोए हुए) सरीखा भासता है कि जिसे ग्रहपति घर में होते हुवे भी उसका दर्शन नहीं होता ।