किं किज्जइ बहु अक्खरहं जे कालिं खउ जंति ।
जेम अणक्खरु संतु मुणि तव वढ मोक्खु कहंति ॥124॥
अन्वयार्थ :
हे वत्स ! थोडे ही काल में क्षय हो जाते हैं ऐसे बहुत से अक्षरों को तुझे क्या करना है ? मुनि तो जब अनक्षर
(शब्दातीत-इन्द्रियातीत)
हो जाते हैं, तब मोक्ष को पाते हैं ।