छहदंसणगंथि बहुल अवरुप्परु गज्जंति ।
जं कारणु तं इक्कु पर विवरेरा जाणंति ॥125॥
अन्वयार्थ : षट्दर्शन के ग्रंथ एक-दूसरे पर बहुत गरजते हैं; उन सबसे परे मोक्ष का जो एक कारण है, उसे तो कोई विरले ही जानते हैं ।