सिद्धंतपुराणहिं वेय वढ बुज्झतहं णउ भंति ।
आणंदेण व जाम गउ ता वढ सिद्ध कहंति ॥126॥
अन्वयार्थ :
हे वत्स ! तू सिद्धान्त को तथा पुराण को जान, उसके जानने से भ्रान्ति नहीं रहती । हे वत्स ! जो आनन्द-स्वरूप मे जम गये, वे सिद्ध कहलाते हैं ।