सिवसत्तिहिं मेलावडा इहु पसुवाहमि होइ ।
भिण्णिय सत्ति सिवेण सिहु विरला बुज्जइ कोइ ॥127॥
अन्वयार्थ : इस लोक में शिव और शक्ति का मेला (मिलन) तो पशुओं में भी होता है; परन्तु शिव से भिन्न शक्तिवाले शिव को तो कोई विरला ही पहिचानता है। (लोग तो पशु आदि में भी व्यापक ऐसे सर्व-व्यापी शिव को मानते हैं, परन्तु उससे भिन्न अपने आत्मा को ही शिव-स्वरूप से तो कोई विरला ज्ञानी ही पहिचानता है ।)