भिण्णउ जेहिं ण जाणियउ णियदेहहं परमत्थु ।
सो अंधउ अवरहं अंधयहं किम दरिसावइ पंथु ॥128॥
अन्वयार्थ :
जिसने देह से भिन्न निज परमार्थ-तत्व को नहीं जाना, वह अन्धा दूसरे अन्धे को मुक्तिपंथ कैसे दिखलायेगा ?