जोइय भिण्णउ झाय तुहुं देहहं ते अप्पाणु ।
जइ देहु वि अप्पउ मुणहि ण वि पावहि णिव्वाणु ॥129॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! तुम देह से भिन्न आत्मा का ध्यान करो । यदि देह को अपना मानोगे तो तुम निर्वाण नहीं पा सकोगे ।