छत्तु वि पाइ सुगुरुवडा सयलकालसंतावि ।
णियदेहडइ वसंतयहं पाहण वाडि वहाइ ॥130॥
अन्वयार्थ :
सुगुरु की महान छत्रछाया पाकर भी हे जीव ! तू सकल काल संताप को ही प्राप्त हुआ । परमात्मा निज-देह में बसते हुए भी तूने पत्थर के ऊपर पानी ढोला ।