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गाथा १३१-१४०
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मा मुट्टा पसु गरुवडा सयल काल झंखाइ ।
णियदेहहं मि वसंतयहं सुण्णा मढ सेवाइ ॥131॥
अन्वयार्थ :
हे वत्स ! सुगुरु का संग छोडकर तू सदा काल झंखना
(व्यग्रता)
मत कर । परमात्मा निज-देह में बसता हुआ भी तू शून्य मठ का सेवन क्यों करता है ?