सयवयल्लहिं छहरसहिं पंचहिं रुवहिं चित्तु ।
जासु ण रंजिउ भुवणयलि सो जोइय करि मित्तु ॥132॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! इस भुवनतल में तू ऐसे योगी को अपना मित्र बना कि जिसका चित्त राग के कलकल से, छह रस से तथा पांच रूप से रंजित न हो ।