अरि जिय जिणवरि मणु ठवहि विसयकसाय चएहि ।
सिद्धिमहापुरि पइसरहि दुक्‍खहं पाणिउ देहि ॥134॥
अन्वयार्थ : अरे जीव ! तेरे मन में जिनवर को स्थाप, विषय-कषाय को छोड़, सिद्ध-महापुरी में प्रवेश कर और दुःखों को पानी में जलांजलि दे ।