मुंडियमुंडिय मुंडिया सिरु मुंडिउ चित्तु ण मुंडिया ।
चित्तहं मुंडणु जि कियउ संसारहं खंडणु तिं कियउ ॥135॥
अन्वयार्थ : मूंड़ मुंड़ानेवाले में श्रेष्ठ हे मुंढका ! तूने शिर का तो मुंडन किया, परंतु चित्त को न मुंड़ा । जिसने चित्त का मुण्ड़न किया, उसने संसार का खंड़न कर डाला ।