अप्पु करिज्जइ काइं तसु जो अच्छई सव्वंगओ संते ।
पुण्णविसज्जणु काइं तसु जो हलि इच्छइ परमत्थे ॥136॥
अन्वयार्थ :
सर्वांग में जो सुस्थित है, उस धर्मात्मा को पाप क्या करेगा ? उसी प्रकार जो परमार्थ का इच्छुक है, उस सज्जन को पुण्य का भी क्या काम है ?