गमणागमणविवज्जियउ जो तइलोयपहाणु ।
गंगइ गरुवइ देउ किउ सो सण्णाणु अयाणु ॥137॥
अन्वयार्थ :
जो गमनागमन से रहित है ओर तीन-लोक में प्रधान हैं ऐसे देव की
(तीर्थकर देव की)
की गरवी गंगा सुज्ञ पुरुषों के लिये सम्यग्ज्ञान प्रगट करनेवाली है ।