कासु समाहि करउं को अंचउं ।
छोपु अछोपु भणिवि को वंचउं ॥
हल सहि कलह केण सम्माणउं ।
जहिं जहिं जोवउं तहिं अप्पणउ ॥139॥
अन्वयार्थ : मैं जहाँ-जहाँ देखता हूँ, वहाँ सर्वत्र आत्मा ही दिखता है, तब फिर में किसकी समाधि करूँ और किसको पुजूँ ? छूत-अछूत कहकर किसका तिरस्कार करूँ ? हर्ष या क्लेश किसके साथ करूँ ? और सन्‍मान किसका करूँ ?