जइ मणि कोहु करिवि कलहीजइ ।
तो अहिसेउ णिरंजणु कीजइ ॥
जहिं जहिं जोयउ तहिं णउ को वि उ ।
हउं ण वि कासु वि मज्झु वि को वि उ ॥140॥
अन्वयार्थ : यदि मन क्रोधादि से कलुषित हो जाय तो निरंजन तत्त्व की भावनारूप निर्मल जल से आत्मा का अभिषेक करना कि जहाँ-जहाँ देखूँ वहाँ कोई भी मेरा नहीं है; न मैं किसी का हूँ, न कोई मेरा है ।