
णमिओ सि ताम जिणवर जाम ण मुणिओ सि देहमज्झम्मि ।
जइ मुणिउ देहमज्झाम्मि ता केण णवज्जए कस्स ॥141॥
अन्वयार्थ : हे जिनवर ! जब तक मैंने देह में रहे हुए 'जिन' को न जाना, तब तक तुझे नमस्कार किया; परन्तु जब देह में ही रहे हुए 'जिन' को जान लिया, तब फिर कौन किसको नमस्कार करे ?