ता संकप्पवियप्पा कम्मं अकुणंतु सुहासुहाजणयं ।
अप्पसरुवासिद्धी जाम ण हियए परिफुरइ ॥142॥
अन्वयार्थ : जीव को संकल्प-विकल्प तब तक रहता है, जब तक कि शुभाशुभ जनक कर्म का अकर्ता होकर, उसके अन्तर मे आत्मस्वरूप की सिद्धि स्फुरायमान न हो जावे ।