कि बहुएं अडवड वडिण देह ण अप्पा होइ ।
देहहं भिण्णउ णाणमउ सो तुहुं अप्पा जोइ ॥145॥
अन्वयार्थ : बहुत अटपट बड़बड़ाने से क्या ? देह आत्मा नहीं है । देह से भिन्न जो ज्ञानमय है वही तू आत्मा है । हे योगी ! उसको तू देख !