पोत्था पढणिं मोक्खु कहं मणु वि असुद्धउ जासु ।
बहुयारउ लुब्दउ णवइ मूलट्टिउ हरिणासु ॥146॥
अन्वयार्थ : मन ही जिसका अशुद्ध है, उसे पोथा पढ़ने से भी मोक्ष कैसा ? वैसे तो हिरन का वध करनेवाला पारधी भी हिरन के सामने नमता है । (जैसे भावशुद्धि से रहित उस पारधी का वह नमन, सच्चा नमन नहीं है, वैसे भावशुद्धि से रहित शास्त्रपठन भी मोक्ष का कारण नहीं होता । अतः हे जीव ! तू भावशुद्धि कर ।)