दयाविहीणउ धम्मडा णाणिय कह वि ण जोइ ।
बहुएं सलिलविरोलियइं करु चोप्पडा ण होइ ॥147॥
अन्वयार्थ : जैसे बहुत पानी के विलोडने से हाथ चिकना नहीं होता (अर्थात् घी नहीं निकल पाता), वैसे दया से रहित धर्म ज्ञानियों ने कहीं भी नहीं देखा ।