संखसमुद्दहिं मुक्कियए एही होइ अवत्थ ।
जो दुव्वाहहं चुंबिया लाएविणु गलि हत्थ ॥150॥
अन्वयार्थ :
शंख के पेट में रहे हुए मुक्ताफल मोती के कारण से उसकी ऐसी हालत होती है कि धीवर-मच्छीमार उसका गला फाडकर उस मोती को बाहर निकालता है ।
(इस प्रकार परिग्रहसे जीव दुःखी होता है ।)