+ गाथा १५१-१६० -
छंडेविणु गुणरयणणिहि अग्घथडिहिं घिप्पन्ति ।
तहिं संखाहं विहाणु पर फुक्किज्जंति ण भंति ॥151॥
अन्वयार्थ : गुणरत्ननिधि (समुद्र) का संग छोडने से शंख की कैसी हालत होती है ? अर्थात्‌ बाजार में उसका विक्रय होता है और बाद में किसी के मुँह से फूंका जाता है, इसमें भ्रान्ति नहीं । (गुणीजन का संग छोड़ने से ऐसा बेहाल होता है।)