महुयर सुरतरुमंजरिंहिं परिमलु रसिवि हयास ।
हियडा फुट्टिवि कि ण मुयउ ढंढोलंतु पलास ॥152॥
अन्वयार्थ : हे हताश मधुकर ! कल्पवृक्ष की मंजरी का सुगंध-युक्त रस चख करके भी अब तू गंध-रहित पलाश के उपर क्‍यों भ्रमता फिरता है ?
अथवा अरे! ऐसा करते हुए तेरा हृदय फट क्‍यों नहीं गया और तू मर क्‍यों नहीं गया ! (अत्यंत मधुर चैतन्यरस का स्वाद लेने के बाद अन्य नीरस विषयों में उपयोग का भ्रमण हो, उसमें ज्ञानी को मरण जैसा दुःख लगता है।)