
मुंडु मुंडाइवि सिक्ख धरि धम्महं वद्धी आस ।
णवरि कुडुंबउ मेलियउ छुडु मिल्लिया परास ॥153॥
णग्गत्तणि जे गव्विया विग्गुत्ता ण गणंति ।
गंथहं बाहिरभिंतरिहिं एक इ ते ण मुयंति ॥154॥
अन्वयार्थ : मूंड मुंडाया, उपदेश लिया, धर्म की आशा बढ़ी एवं कुटम्ब को छोड़ा, पर की आशा भी छोड़ी -- इतना सब करने पर भी जो नग्नत्व से गर्वित है और त्रिगुप्ति की परवाह नहीं करता उसने तो बाह्य या अंतरंग एक भी ग्रंथ को नहीं छोडा ।