अम्मिय इहु मणु हत्थिया विंझह जंतउ वारि ।
ते भंजेसइ सीलवणु पुणु पडिसइ संसारि ॥155॥
अन्वयार्थ : अरे ! इस मनरूपी हाथी को विंध्य-पर्वत की ओर जाने से रोको, अन्यथा वह शील के वन को तोड़ देगा तथा जीव को संसार में पटक देगा ।