विद्धा वम्मा मुट्टिइण फसिवि लिहिहि तुहुं ताम ।
जह संखहं जीहालु सिवि सुड्डच्छलइ ण जाम ॥157॥
अन्वयार्थ : रे विषयांध ! तबतक ही तू विषयों को मुष्टि में लेकर चख ले कि जबतक जिह्वालोलुपी शंख की तरह तेरा शरीर सड़कर शिथिल हो जाय ! (अर्थात्‌ रे मूर्ख! क्षणभंगुर विषयो में क्‍यों रमता है? वे तो क्षण में सड़ जायेंगे।)