पत्तिय तोडहि तडतडह णाइं पइट्टा उट्टु ।
एव ण जाणहि मोहिया को तोडइ को तुट्टु ॥158॥
अन्वयार्थ : जैसे वन में ऊँट ने प्रवेश किया हो, वैसे हे जीव ! तू तड़ातड़ पतियों को तोड़ता है, परन्तु मोह के वशीभूत होकर तू यह नहीं जानता कि कौन तोड़ता है और कौन टूटता है ? (वनस्पति में भी तेरे जैसा जीव है--ऐसा तू जान और उसकी हिंसा न कर ।)