पत्तिय तोडि म जोइया फलहिं जि हत्थु म वहि । जसु कारणि तोडेहि तुहुं सो सिउ एत्थु चढाहि ॥160॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! पत्तों को मत तोड़ और फलों को भी हाथ मत लगा, किन्तु जिसके लिये तू इन्हें तोड़ता है, उसी शिव को यहाँ चढ़ा दे ! (व्यंग्य करते हुए कवि कहता है कि हे शिव-पुजारी ! वे शिव यदि पत्ते से ही प्रसन्न हो जाते हैं तो उन्हें ही वृक्ष के ऊपर क्यों नहीं चढ़ा देता ?)