+ गाथा १६१-१७० -
देवलि पाहणु तित्थि जलु पुत्थइं सव्वइं कव्वु ।
वत्थु जु दीसइ कुसुमियउ इंधणु होसइ सव्वु ॥161॥
अन्वयार्थ : देवालय के पाषाण, तीर्थ का जल या पोथी के सब काव्य इत्यादि जो भी वस्तु फूली-फली दिखती है, वह सब ईन्धन हो जायेंगी । (उन सबको क्षणभंगुर जानकर अविनाशी आत्मा को ध्यावो ।)