तित्थईं तित्थ भमंतयहं किण्णेहा फल हूव ।
बाहिरु सुद्धउ पाणियहं अब्भिंतरु किम हूव ॥162॥
अन्वयार्थ : अनेक तीर्थों में भ्रमण करने पर भी कुछ फल तो न हुआ । बाह्य में तो पानी से शुद्ध हुआ, परन्तु अन्तर में कौन सी शुद्धि हुई ?