तित्थइं तित्थ भमेहि वढ धोयउ चम्मु जलेण ।
एहु मणु किम धोएसि तुहुं मइलउ पावमलेण ॥163॥
अन्वयार्थ : हे वत्स ! अनेक तीर्थों में तूने भ्रमण किया और शरीर के चमड़े को जल से धोया, परन्तु पापमल से मलिन ऐसे तेरे मन को तू कैसे धोयेगा ?