
एक्कु सुवेयइ अण्णु ण वेयइ ।
तासु चरिउ णउ जाणहिं देव इ ॥
जो अणुहवइ सो जि परियाणइ ।
पुच्छंतहं समिति को आणइ ॥165॥
अन्वयार्थ : जो एक का अनुभव करता है और अन्य को नहीं अनुभवता, उसका चरित्र देव भी नहीं जानते; जो अनुभव करता है, वही उसको अच्छी तरह जानता है । पूछताछ से इसकी संतृप्ति कैसे होवे ?