जं लिहिउ ण पुच्छिउ कह व जाइ ।
कहियउ कासु वि णउ चिति ठाइ ।
अह गुरुवएऐसें चिति ठाइ ।
तं तेम धरंतिहिं कहिं मि ठाइ ॥166॥
अन्वयार्थ : जानते हुए भी वह तत्त्व लिखने में नहीं आता, पूछनेवालों से कहा भी नहीं जाता; कहने से किसी के चित्त में वह नहीं ठहरता । गुरु के उपदेश से यदि किसी के चित्त में वह ठहरता है तो चित्त में धारण करनेवाले के वह सर्वत्र अन्तरंग में स्थित रहता है ।