कड्ढइ सरिजलु जलहिविपिल्लिउ ।
जाणु पवाणु पवणपडिपिल्लिउ ॥
बोह विबोहु तेम संघट्टइ ।
अवर हि उत्तउ ता णु पयट्टइ ॥167॥
अन्वयार्थ : नदी का जल जलधि के द्वारा विरुद्ध दिशा मे धकेला जाता है, बड़ा जहाज भी पवन के संघर्ष से विरुद्ध दिशा में खिंच जाता है; वैसे ज्ञान और अज्ञान का संघर्ष होने पर दूसरी ही प्रवृत्ति होती है । (कुसंग से जीव अज्ञान की ओर खिंच जाता है ।)