बरि विविहु सद्दु जो सुम्मइ ।
तहिं पइसरहुं ण वुच्चइ दुम्मइ ॥
मणु पंचहिं सिहु अत्थवण जाइ ।
मूढा परमतत्तु फुडु तहिं जि ठाइ ॥168॥
अन्वयार्थ : आकाश में जो विविध शब्द (दिव्यध्वनि का उपदेश) हैं, सुमति उसका अनुसरण करता है; किन्तु दुर्मति जीव उसका अनुसरण नहीं करता । पांच इन्द्रिय सहित मन जब अस्त हो जाता है, तब परमतत्त्व प्रगट होता है, उसमें हे मूढ ! तू स्थिर हो ।