अखइ णिरामइ परमगइ अज्ज वि लउ ण लहंति ।
भग्गी मणहं ण भंतडी तिम दिवहडा गणंति ॥169॥
अन्वयार्थ :
अरे रे ! अक्षय निरामय परमगति की प्राप्ति अभी तक न हुई । मन की भ्रान्ति न मिटी और ऐसे ही दिवस बीते जा रहे हैं ।