सहजअवत्थहिं करहुलउ जोइय जंतउ वारि ।
अखइ णिरामइ पेसियउ सइं होसइ संहारि ॥170॥
अन्वयार्थ : हे योगी ! विषयों से तेरे मन को रोककर शीघ्र सहज अवस्थारूप कर; अक्षय निरामय स्वरूप में प्रवेश करते ही, स्वयं उस मन का संहार हो जायगा ।