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गाथा १७१-१८०
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अखइ णिरामइ परमगइ मणु घल्लेप्पिणु मिल्लि ।
तुट्टेसइ मा भंति करि आवागमणहं वेल्लि ॥171॥
अन्वयार्थ :
अक्षय निरामय परमगति में प्रवेश करके मन को छोड़ दे, तेरी आवागमन की बेल टूट जाएगी, इसमे भ्रान्ति न कर ।