एमइ अप्पा झाइयइ अविचलु चित्तु धरेवि ।
सिद्धिमहापुरि जाइयइ अट्ट वि कम्म हणेवि ॥172॥
अन्वयार्थ :
इसप्रकार चित्त को अविचल स्थिर करके आत्मा का ध्यान होता है तथा अष्टकर्म को नष्टकर सिद्धि-महापुरी में गमन होता है ।