अक्खरचडिया मसिमिलिया पाढंता गय खीण ।
एक्क ण जाणी परम कला कहिं उग्गउ कहिं लीण ॥173॥
अन्वयार्थ :
स्याही से लिखे गये ग्रन्थ पठन करते-करते क्षीण हो गये, परन्तु हे जीव ! तू कहाँ उत्पन्न हुआ और कहाँ लीन होगा -- इस एक परम कला को तूने न जाना ।
(मात्र शास्त्र-पठन किया, किन्तु आत्मा को न जाना !)